महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (062) : Niru Ashra
महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (062) (स्वामी अखंडानंद सरस्वती ) जो जैसेहि तैसेहि उठि धायीं-3 सर्वं पदं हस्तिपदे निमग्नम् जितना दुःख उसके जीवन में होने वाला था, वह सब दुख भगवान के विरह में एक साथ ही हो गया- दुःसह प्रेष्ठविरह, अपने परम प्रियतम का जो दुःसह विरह हुआ उस विरह के तीव्र ताप से … Read more