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August 30, 2025 5:13 am

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!- पंचत्रिंशत् अध्याय : Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!- पंचत्रिंशत् अध्याय : Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! ( पंचत्रिंशत् अध्याय : ) गतांक से आगे – प्रेम की मधुरता , प्रेम का बंधन , प्रेम की शृंखला ….युक्ति सिद्धान्त और शास्त्र तत्व के विधि नियम के अन्तर्गत ये नही आते ….शास्त्रीय विधि निषेध को प्रेम मान्यता नही देता …उसके अपने शास्त्र हैं उसके अपने नियम हैं … Read more

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !!-गहरो प्रेम समुद्र को भाग 3 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !!-गहरो प्रेम समुद्र को भाग 3 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !! गहरो प्रेम समुद्र कोभाग 3 हाँ राधे ! विरह प्रेम को पुष्ट करता है ………मिलन प्रेम को घटा सकता है ……….पर विरह प्रेम को बढ़ाता है …….इसलिये मैं अंतर्ध्यान हुआ हूँ ………फिर गम्भीर हो गए थे कृष्ण ……..राधे ! गोपियों जैसा प्रेम इन जगत में किसी का नही है ….न था … Read more

उद्धव गोपी संवाद( भ्रमर गीत) ४९ एवं ५० : Niru Ashra

उद्धव गोपी संवाद( भ्रमर गीत) ४९ एवं ५० : Niru Ashra

उद्धव गोपी संवाद( भ्रमर गीत)४९ एवं ५० कोहू कहै री मधुप,भेष उन्हं कौ क्यौं धारयौ।स्याम,पीत,गुंजार -बेनुं-किंकिनि झंनकारयौ।।वा-पुर गोरस चोरि कें,फिरि आयौ इहि देस।इन्ह कों जिन्ह मानों कोऊ,कपटी इन्ह कौ भेष।।— चोरि जिन्ह जाइ कछु।।भावार्थ:-कोई गोपी कह रही हैं कि भंवरे तूने अपना भेष कृष्ण की तरह क्यों बनाया है,वही स्याम रंग,पीली बांसुरी और गुन गुन … Read more

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! – चतुस्त्रिंशत् अध्याय : Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! – चतुस्त्रिंशत् अध्याय : Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! ( चतुस्त्रिंशत् अध्याय: ) गतांक से आगे – प्रियतमे ! तुमसे किसने कहा कि मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ ? तुम मिथ्या शोक कर रही हो । हे प्रिया ! तुम मेरी प्राण हो …ये कहते हुए निमाई ने विष्णुप्रिया को अपने गोद में बिठा लिया था ….बेचारी प्रिया … Read more

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !!-गहरो प्रेम समुद्र को भाग 2 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !!-गहरो प्रेम समुद्र को भाग 2 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !! गहरो प्रेम समुद्र कोभाग 2 तभी ………रँग देवि ! सुदेवी ! विशाखा ! चित्रा ! आओ इधर इधर आओ ! ललिता सखी फिर चिल्लाईं । ये सारी सखियाँ फिर दौड़ीं ……..हाँ क्या हुआ ललिता ! क्या हुआ ? ये देखो ! ललिता सखी फिर दूसरे चरण चिन्ह दिखानें लगी थीं । … Read more

ધાર્મિક કથા : ભાગ 185 : Manoj Acharya

ધાર્મિક કથા : ભાગ 185 : Manoj Acharya

ધાર્મિક કથા : ભાગ 185આજ વૈશાખ સુદ ચોથે થયો હતો ભગવાન ગણેશજીનો બીજો જન્મ..!ગણેશજી એટલે સૌ દેવામાં પ્રથમ! કોઈપણ શુભ કાર્ય પહેલા વિઘ્નહર્તાને યાદ કરવામાં આવે છે, કારણ કે તેઓ તો રિદ્ધિ સિદ્ધિના નૌ દાતા છે, સર્વે સુખો આપનાર છે. આપણે સૌ કોઈ જાણીએ છે ગણેશજીનો જન્મ ભાદરવા સુદ ચોથના દિવસે થયો હતો અને દેશભરમાં … Read more

ધાર્મિક કથા : ભાગ 184 : Manoj Acharya

ધાર્મિક કથા : ભાગ 184 : Manoj Acharya

ધાર્મિક કથા : ભાગ 184અખા ત્રીજ (અક્ષય તૃતીયા) નું આટલું બધું મહત્વ છે…. જાણો દશ બાબતો.(૧) કળીયુગ પ્રારંભ — આ દિવસથી કળીયુગનો પ્રારંભ થયો હતો…. આથી અમુક રાજ્યોમાં પૂજા અર્ચનાનું વિશેષ મહત્વ છે.(૨) પરશુરામ જન્મ દિવસ — ભગવાન વિષ્ણુના છઠ્ઠા અવતાર પરશુરામનો ઋષિ જમદગ્નિ અને માતા રેણુકાને ત્યાં બ્રાહ્મણ કુળમાં અખાત્રીજે જન્મ થયો હતો.. પરશુરામ … Read more

उद्धव गोपी संवाद(भ्रमर गीत) ४७ एवं ४८ : Niru Ashra

उद्धव गोपी संवाद(भ्रमर गीत) ४७ एवं ४८ : Niru Ashra

उद्धव गोपी संवाद(भ्रमर गीत)४७ एवं ४८ कोहू कहै अहो मधुप, तुम्हें लाज हू न आवत।स्वामी तुम्हरौ कान्ह,कूबरी दास कहावत।।यहां ऊंची पदवी हती, गोपीनाथ कहाइ।अब जदुकुल पावन भयौ,दासी जूंठन खाइ।।– मरत कहा बोल कों।।भावार्थ:-भंवरा के मिस करिके, गोपियां ऊधौ जी को सुना रही हैं कि अरे भंवरे, तुम्हें जरा भी लाज नहीं आती कि तुम्हारे स्वामी … Read more

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! : त्रयत्रिंशत् अध्याय: Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! : त्रयत्रिंशत् अध्याय: Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !! ( त्रयत्रिंशत् अध्याय: ) गतांक से आगे – आज रात्रि संकीर्तन में नही गये निमाई ..माता को समझाने में समय लग गया ..फिर जब घर का वातावरण कारुणिक देखा तो वो आज रुक गये । विष्णुप्रिया ने अपने को सम्भालते हुये भोजन तैयार किया ..भोजन बनाते विष्णुप्रिया को जब … Read more

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !!-गहरो प्रेम समुद्र कोभाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !!-गहरो प्रेम समुद्र कोभाग 1 : Niru Ashra

!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 40 !! गहरो प्रेम समुद्र कोभाग 1 ब्रह्म और जीव का सरस विहार ही नित्य है …..बाकी सब अनित्य है । यह मधुर मिलन ही सत्य है …….बाकी सब मिथ्या है । पर सत्य बात ये है वज्रनाभ ! कि इस विहार की अधिकारिणी तो एक मात्र बृज गोपिकाएँ ही हैं……उनका प्रेम ! … Read more